“पिघलती आयतें”

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चाँदनी रात के तले
मेरे जिस्म के पन्नों पर

जब तुम्हारी उंगलियाँ
आयतें लिखती हैं

मेरे जिस्म पर छपी हर तिल
तुम्हारे लब्ज़ों की, बन जाती है चँद्रबिंदू

तुम्हारी भावनाओं की स्याही
टकराती है मेरे दिल की धड़कनो से

लब्ज़ बहते हैं फिर बेबाक
मेरे जिस्म के हर उतार हर चढ़ाव पर

लेकिन तुम्हारी नज़रों की हरारत
हर लब्ज़ को पिघला देती है

और फिर तुम्हारे लब
उन पिघलती हुई आयतों को पी जाते हैं

तुम्हारी गज़ल बन जाती हूँ मैं
कहती हूँ धीरे से तुम्हारे कानों में
बहुत करीब आ कर….

“फिर से लिखो न मुझ पर तुम….
एक कोरा कागज़ हूँ मैं, देखो न……तुम्हारा….”

~ विभावरी

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