उन्हें भी ज़िद्द ना पास आने की
हमें भी ज़िद्द दूर दूर जाने की
इस ‘अपनी’ ज़िद्द के आगे
तुम भी हारे
मैं भी हारी
वक़्त चला
कहके अलविदा
फिर वो ना आया
तुमने बुलाया
मैंने भी बुलाया
चांदनी रूठी है कबसे
वो ज़रा न मानी
तुमने मनाया
मैंने भी मनाया
तारे सिसकते हैं कबसे
वो ना मुस्कुराये फिर से
तुमने हँसाया
मैंने गुदगुदाया
फ़ोन अब भी बजता है
पर सुर में नही
तुमने ना उठाया
मैंने भी ना उठाया
खामोशियाँ कुछ तो कहती हैं
अनसुनी तुम भी करते हो
और मैं भी सुनती नही
आँखें भर तो आती हैं
पर अश्क़ तुम छलकाते नही
मैं भी बस मुस्कुरा देती हूँ
रातें बहुत लम्बी और ठण्डी हो चली हैं
पर तुम काँपते नही
मैं भी ठिठुरती नही
मौसम रंग बदलते हैं
पतझड़, सर्दियाँ, सावन और गर्मियाँ
पर तुम ना बदले
और मैं भी ना बदली
पर एक गाना तुम भी गुनगुनाते हो
और मैं भी
तुम सुबह,
मैं दोपहर को
तुम शाम,
मैं रात को
तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई, शिक़वा, तो नही
शिक़वा नही, शिक़वा नही, शिक़वा नही
तेरे बिना ज़िन्दगी भी लेकिन, ज़िन्दगी, तो नही
ज़िन्दगी नही, ज़िन्दगी नही, ज़िन्दगी नही……
– विभावरी
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